
कोयंबटूर।
भारतीय नौसेना के एक नाविक को संवेदनशील रक्षा एवं समुद्री जानकारी कथित तौर पर पाकिस्तान की एक खुफिया ऑपरेटिव तक पहुंचाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। आंध्र प्रदेश पुलिस की काउंटर इंटेलिजेंस (CI) टीम ने यह कार्रवाई तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित INS Agrani में की। गिरफ्तार नाविक की पहचान 31 वर्षीय प्रदीप मुखर्जी के रूप में हुई है। अधिकारियों के अनुसार, वह मूल रूप से पश्चिम बंगाल का रहने वाला है और वर्ष 2014 में भारतीय नौसेना में शामिल हुआ था।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, प्रदीप मुखर्जी उस समय INS Agrani में एक मैनेजमेंट डेवलपमेंट कोर्स में हिस्सा ले रहा था। वह करीब एक सप्ताह पहले ही कोयंबटूर पहुंचा था। उसकी गिरफ्तारी 3 अक्टूबर 2026 को की गई। अधिकारियों के अनुसार, वह पूर्वी नौसेना कमान के तहत विशाखापत्तनम में तैनात था। जांच एजेंसियों को संदेह है कि सोशल मीडिया के माध्यम से उसके संपर्क में आई एक महिला ने कथित तौर पर उसे ‘हनी ट्रैप’ में फंसाया और धीरे-धीरे उससे संवेदनशील सूचनाएं हासिल कीं।
सोशल मीडिया के जरिए बना संपर्क
जांच अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तानी खुफिया तंत्र से जुड़ी बताई जा रही महिला ने कुछ महीने पहले सोशल मीडिया के माध्यम से प्रदीप मुखर्जी से संपर्क किया था। दोनों के बीच ऑनलाइन बातचीत बढ़ती गई और कथित तौर पर इसी संपर्क का इस्तेमाल संवेदनशील जानकारी हासिल करने के लिए किया गया।
रिपोर्टों के मुताबिक, जांच में विशाखापत्तनम स्थित नौसैनिक प्रतिष्ठानों से संबंधित रणनीतिक परिसंपत्तियों, नौसैनिक गतिविधियों और अन्य परिचालन संबंधी जानकारी साझा किए जाने का आरोप सामने आया है। हालांकि, जांच अभी जारी है और एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि वास्तव में कितनी तथा किस स्तर की गोपनीय जानकारी कथित तौर पर साझा की गई।
काउंटर इंटेलिजेंस टीम ने संदिग्ध डिजिटल गतिविधियों का पता चलने के बाद प्रदीप की गतिविधियों पर निगरानी शुरू की थी। जांच आगे बढ़ने पर नौसेना अधिकारियों से आवश्यक अनुमति लेने के बाद उसे INS Agrani परिसर से हिरासत में लिया गया। बाद में उसे अदालत के समक्ष पेश कर आगे की जांच के लिए विजयवाड़ा ले जाया गया।
क्या होता है ‘हनी ट्रैप’?
खुफिया मामलों में ‘हनी ट्रैप’ उस तरीके को कहा जाता है जिसमें किसी व्यक्ति के साथ भावनात्मक, रोमांटिक या व्यक्तिगत संबंध स्थापित करके उससे गोपनीय या संवेदनशील जानकारी हासिल करने का प्रयास किया जाता है। आधुनिक दौर में यह तरीका केवल आमने-सामने के संपर्क तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया, मैसेजिंग एप और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए नकली पहचान बनाकर भी ऐसे संपर्क स्थापित किए जा सकते हैं।
भारतीय रक्षा प्रतिष्ठानों को इस तरह के खतरों को लेकर पहले भी आगाह किया जाता रहा है। रक्षा मंत्रालय ने 2019 में संसद में बताया था कि विदेशी खुफिया एजेंसियों द्वारा ‘हनी ट्रैप’ को एक तरीके के रूप में इस्तेमाल किए जाने के संबंध में सशस्त्र बलों के जवानों और उनके परिवारों को नियमित रूप से जागरूक किया जाता है। मंत्रालय ने यह भी कहा था कि ऐसे प्रयासों का पता लगाने के लिए संबंधित एजेंसियों के बीच खुफिया समन्वय रखा जाता है।

पहले भी सामने आते रहे हैं ऐसे मामले
प्रदीप मुखर्जी का मामला ऐसा पहला प्रकरण नहीं है जिसमें भारतीय रक्षा क्षेत्र से जुड़े किसी व्यक्ति पर सोशल मीडिया आधारित हनी ट्रैप के जरिए विदेशी खुफिया तंत्र को संवेदनशील जानकारी देने का आरोप लगा हो।
मार्च 2026 में उत्तर प्रदेश ATS ने आगरा से भारतीय नौसेना के एक 24 वर्षीय कर्मी को कथित तौर पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। अधिकारियों के अनुसार, वह भी सोशल मीडिया के जरिए कथित हनी ट्रैप का शिकार हुआ था और उस पर संवेदनशील सैन्य सूचनाएं साझा करने का आरोप लगाया गया था।
अगस्त 2026 में दिल्ली में एक भारतीय वायुसेना अधिकारी से जुड़े मामले में भी पुलिस ने पाकिस्तानी खुफिया तंत्र से कथित संपर्क और सोशल मीडिया के जरिए हनी ट्रैप का मामला सामने आने की जानकारी दी थी। रिपोर्टों के अनुसार, अधिकारी पर सैन्य गतिविधियों, तस्वीरों और अन्य संवेदनशील जानकारी साझा करने के आरोप लगे थे।
इसके अलावा, पिछले वर्षों में भी रक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों को सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से कथित तौर पर निशाना बनाए जाने के मामले सामने आते रहे हैं। रक्षा मंत्रालय ने संसद में यह स्वीकार किया है कि सशस्त्र बलों में हनी ट्रैप से जुड़े मामले सामने आए हैं और ऐसे मामलों की जांच की जाती है।
जांच एजेंसियों के सामने कई सवाल
प्रदीप मुखर्जी की गिरफ्तारी के बाद अब जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि कथित तौर पर कितनी संवेदनशील जानकारी साझा की गई और उसका संभावित सुरक्षा प्रभाव क्या हो सकता है। एजेंसियां उसके डिजिटल संपर्कों, सोशल मीडिया गतिविधियों और कथित विदेशी संपर्कों की जांच कर रही हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक, जांच में यह भी पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि कहीं इस पूरे मामले में आर्थिक लेन-देन की भूमिका तो नहीं थी। साथ ही एजेंसियां यह जानने की कोशिश कर रही हैं कि क्या आरोपी अकेले संपर्क में था या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था।
रक्षा कर्मियों के लिए साइबर सतर्कता जरूरी
इस घटना ने एक बार फिर रक्षा प्रतिष्ठानों से जुड़े कर्मचारियों के लिए सोशल मीडिया सुरक्षा और साइबर सतर्कता की आवश्यकता को सामने ला दिया है। आज के दौर में खुफिया जानकारी हासिल करने के लिए केवल पारंपरिक जासूसी तरीकों का इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि सोशल मीडिया प्रोफाइल, ऑनलाइन दोस्ती और डिजिटल संचार माध्यमों का भी दुरुपयोग किया जा सकता है।
ऐसे मामलों में फर्जी पहचान बनाकर संपर्क करने वाले लोग लंबे समय तक सामान्य बातचीत के जरिए भरोसा कायम करने की कोशिश कर सकते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे व्यक्तिगत या पेशेवर जानकारी हासिल करने का प्रयास किया जा सकता है। यही कारण है कि रक्षा संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों को संदिग्ध ऑनलाइन संपर्कों और अनजान लोगों के साथ संवेदनशील जानकारी साझा करने को लेकर लगातार सतर्क रहने की सलाह दी जाती है।
फिलहाल प्रदीप मुखर्जी के खिलाफ लगे आरोप जांच के अधीन हैं और मामले की पूरी तस्वीर जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। काउंटर इंटेलिजेंस एजेंसी कथित सूचना लीक की प्रकृति, उसके स्रोत और संभावित नेटवर्क की जांच कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें एक सक्रिय नौसेना कर्मी के कथित रूप से सोशल मीडिया आधारित संपर्क में आने और संवेदनशील समुद्री जानकारी साझा किए जाने का आरोप है। इससे स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संस्थानों के लिए पारंपरिक सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ डिजिटल सुरक्षा और सोशल मीडिया सतर्कता भी बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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