Decisive warning : बलूचिस्तान में चीन की सैन्य मौजूदगी भारत की सुरक्षा रणनीति के लिए निर्णायक चेतावनी है

बलूचिस्तान में चीन की संभावित सैन्य मौजूदगी को केवल पाकिस्तान का आंतरिक मामला मानना एक गंभीर रणनीतिक भूल होगी। यह घटनाक्रम सीधे-सीधे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और एशिया की शक्ति-संतुलन व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। हाल ही में एक बलूच नेता द्वारा भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को भेजा गया पत्र महज़ एक औपचारिक चेतावनी नहीं, बल्कि आने वाले बड़े भू-राजनीतिक तूफ़ान का संकेत है। यह पत्र इस बात की ओर इशारा करता है कि एशिया के पश्चिमी किनारे पर कुछ ऐसा पक रहा है, जिसके प्रभाव दूरगामी और गहरे होंगे।
चीन की रणनीति कोई नई नहीं है। उसने पहले आर्थिक निवेश के नाम पर सड़कें बनाईं, फिर बंदरगाहों में अपनी पकड़ मज़बूत की और अब धीरे-धीरे सैन्य मौजूदगी की ओर बढ़ रहा है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) केवल एक विकास परियोजना नहीं रहा; यह अब सामरिक विस्तार का औज़ार बन चुका है। ग्वादर बंदरगाह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ व्यापार की आड़ में नौसैनिक और सैन्य ढाँचा तैयार होने की आशंकाएँ लंबे समय से जताई जा रही हैं।
पाकिस्तान की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक चिंताजनक है। वह धीरे-धीरे अपनी संप्रभुता खोता दिख रहा है। आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा चुनौतियों ने उसे इस कदर निर्भर बना दिया है कि उसकी ज़मीन पर कौन आए और क्या करे, इसका अंतिम निर्णय अब इस्लामाबाद के हाथ में नहीं रहा। बलूचिस्तान, जो पहले से ही उपेक्षा, शोषण और हिंसा से जूझ रहा है, अब वैश्विक शक्तियों के टकराव का मैदान बनता जा रहा है।
बलूच जनता का दर्द केवल स्थानीय नहीं है; वह अंतरराष्ट्रीय विवेक को चुनौती देता है। यदि चीन वहां अपनी सेना उतारता है, तो वह केवल निवेश की रक्षा नहीं करेगा, बल्कि स्थानीय असंतोष को दबाने के लिए बल प्रयोग भी कर सकता है। यह स्थिति मानवाधिकारों, क्षेत्रीय अस्थिरता और सीमा पार सुरक्षा खतरों को जन्म देगी। भारत के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि बलूचिस्तान भौगोलिक रूप से भारत के पश्चिमी रणनीतिक हितों के बेहद करीब है।
भारत अब उस दौर में नहीं है जब वह केवल बयान देकर संतोष कर ले। गलवान घाटी की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि शांति की सबसे मज़बूत गारंटी शक्ति और तैयारी होती है। भारत ने खून बहाया, लेकिन झुका नहीं। उस अनुभव ने देश की रणनीतिक सोच को और अधिक स्पष्ट, दृढ़ और व्यावहारिक बना दिया है। आज भारत कूटनीति और सैन्य शक्ति—दोनों को संतुलित तरीके से इस्तेमाल करना जानता है।

जो लोग यह मानते हैं कि भारत केवल कड़े शब्दों तक सीमित रहेगा, उन्हें पिछले एक दशक के घटनाक्रम याद करने चाहिए। 2014 से पहले और आज के भारत में ज़मीन-आसमान का अंतर है। आज का भारत अपने हितों को लेकर स्पष्ट है, और आवश्यक होने पर निर्णय लेने से हिचकता नहीं। चाहे वह सीमाओं पर बुनियादी ढांचे का तेज़ी से विकास हो, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझेदारियाँ हों, या रक्षा क्षमताओं का विस्तार—हर मोर्चे पर भारत ने अपनी गंभीरता साबित की है।
यदि चीन बलूचिस्तान में सैन्य रूप से सक्रिय होता है, तो भारत के सामने दो मोर्चों की चुनौती स्पष्ट रूप से उभर आएगी—एक उत्तर में और दूसरा पश्चिम में। लेकिन यह मान लेना कि भारत इसके लिए तैयार नहीं है, वास्तविकता से आंख चुराने जैसा होगा। भारत की सैन्य योजना, खुफिया तंत्र और कूटनीतिक नेटवर्क ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने की क्षमता रखते हैं। भारत युद्ध नहीं चाहता, लेकिन डर के साये में जीना भी उसकी नीति नहीं है।
चीन और पाकिस्तान की यह तथाकथित “गुप्त चाल” दरअसल भारत को चारों ओर से घेरने की एक कोशिश है। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि भारत अब घेरे में नहीं आता। इतिहास गवाह है कि जब-जब भारत को घेरने की कोशिश हुई है, उसने न केवल उस घेरे को तोड़ा है, बल्कि नई रणनीतिक दिशा भी तय की है। आज भारत वैश्विक मंच पर केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि एक सक्रिय खिलाड़ी है, जिसकी भूमिका को नज़रअंदाज़ करना किसी के लिए आसान नहीं।
डॉ. जयशंकर को लिखा गया पत्र केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक संकेत है कि एशिया में शक्ति-संतुलन तेजी से बदल रहा है। यह चेतावनी है कि अगर समय रहते समझदारी नहीं दिखाई गई, तो क्षेत्र एक बड़े टकराव की ओर बढ़ सकता है। भारत की भूमिका यहां संतुलनकारी भी है और निर्णायक भी। वह शांति का पक्षधर है, लेकिन अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा।
अंततः, अगर चीन ने गलत जगह और गलत समय पर कदम रखा, तो इतिहास उसे याद दिलाएगा कि भारत शांति का देश ज़रूर है, लेकिन कमज़ोरी उसका स्वभाव नहीं। भारत ने पहले भी कठिन परिस्थितियों का सामना किया है और आगे भी करेगा—आत्मविश्वास, तैयारी और दृढ़ संकल्प के साथ।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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