Denied : प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत कर्मचारी को मूल विभाग में लौटना होगा, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शासन के आदेश में दखल से किया इनकार ?

Denied : प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत कर्मचारी को मूल विभाग में लौटना होगा, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शासन के आदेश में दखल से किया इनकार
Denied : प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत कर्मचारी को मूल विभाग में लौटना होगा, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शासन के आदेश में दखल से किया इनकार

बिलासपुर।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने प्रतिनियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि प्रतिनियुक्ति अस्थायी व्यवस्था होती है और कर्मचारी को उधार लेने वाले विभाग या संस्थान में लंबे समय तक बने रहने का कोई स्थायी अथवा कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं होता। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने इस सिद्धांत के आधार पर राज्य शासन के आदेश और स्थानांतरण शिकायत निवारण समिति के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। यह मामला बिलासपुर निवासी प्रीति तिवारी की याचिका से संबंधित है, जिन्होंने प्रतिनियुक्ति समाप्त किए जाने और दूसरे विद्यालय में पदस्थ किए जाने के शासन के आदेश को चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट के इस निर्णय में प्रतिनियुक्ति की प्रकृति और कर्मचारी के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया गया। अदालत के समक्ष सवाल था कि क्या प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत कर्मचारी संबंधित संस्थान में बने रहने का अधिकार मांग सकता है, जबकि राज्य शासन ने उसकी प्रतिनियुक्ति समाप्त कर मूल संवर्ग के अनुरूप दूसरे स्थान पर पदस्थ करने का आदेश जारी किया हो। अदालत ने मामले में राज्य शासन के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

क्या है पूरा मामला?

मामले के अनुसार, बिलासपुर के नेहरू नगर निवासी प्रीति तिवारी मूल रूप से ई-संवर्ग की प्राचार्य हैं। वह उन्नत शैक्षिक अध्ययन संस्थान, बिलासपुर में सहायक प्राध्यापक के रूप में प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत थीं। इसी दौरान राज्य शासन ने 10 जुलाई 2026 को उनकी प्रतिनियुक्ति समाप्त करने का आदेश जारी किया।

शासन के आदेश के तहत प्रीति तिवारी को शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बाल्दाकछार में पदस्थ किया गया। यह विद्यालय विकासखंड कसडोल, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा में स्थित है। इस आदेश के बाद उनकी वर्तमान पदस्थापना को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ और उन्होंने शासन के फैसले के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।

प्रीति तिवारी ने प्रतिनियुक्ति समाप्त करने और दूसरे विद्यालय में पदस्थ करने के निर्णय पर आपत्ति जताई। उन्होंने अपने मामले को स्थानांतरण शिकायत निवारण समिति के समक्ष रखा, ताकि शासन के आदेश पर पुनर्विचार किया जा सके।

हालांकि, वरिष्ठ सचिवों की स्थानांतरण शिकायत निवारण समिति ने 19 अगस्त 2026 को उनकी शिकायत खारिज कर दी। समिति के इस निर्णय के बाद प्रीति तिवारी ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने याचिका दायर कर राज्य शासन के आदेश और समिति के फैसले को चुनौती दी।

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Denied : प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत कर्मचारी को मूल विभाग में लौटना होगा, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शासन के आदेश में दखल से किया इनकार

हाई कोर्ट में शासन के आदेश को दी चुनौती

समिति से राहत नहीं मिलने के बाद प्रीति तिवारी ने हाई कोर्ट में याचिका प्रस्तुत की। याचिका के माध्यम से उन्होंने अपनी प्रतिनियुक्ति समाप्त करने और शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बाल्दाकछार में पदस्थ किए जाने के आदेश को चुनौती दी।

याचिका पर जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने सुनवाई की। मामले में प्रतिनियुक्ति की कानूनी प्रकृति और संबंधित कर्मचारी के अधिकारों का प्रश्न महत्वपूर्ण रहा। अदालत के सामने यह पहलू भी था कि प्रतिनियुक्ति पर काम करने वाले कर्मचारी को संबंधित संस्थान में बने रहने का कोई स्थायी अधिकार प्राप्त होता है या नहीं।

अदालत ने प्रतिनियुक्ति को अस्थायी व्यवस्था बताते हुए इस बात पर जोर दिया कि किसी कर्मचारी को उधार लेने वाले विभाग या संस्थान में लगातार बने रहने का स्थायी अथवा कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। प्रतिनियुक्ति के आधार पर किसी संस्थान में काम करने मात्र से वहां स्थायी रूप से पदस्थ बने रहने का दावा नहीं किया जा सकता।

प्रतिनियुक्ति अस्थायी व्यवस्था, स्थायी अधिकार नहीं

सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रतिनियुक्ति की प्रकृति को महत्वपूर्ण माना। सामान्य तौर पर प्रतिनियुक्ति के तहत किसी कर्मचारी को उसके मूल विभाग से दूसरे विभाग या संस्थान में निर्धारित व्यवस्था के अंतर्गत काम करने के लिए भेजा जाता है। यह व्यवस्था प्रशासनिक जरूरतों और संबंधित नियमों के आधार पर की जाती है।

प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत कर्मचारी का मूल विभाग से संबंध बना रहता है। इसलिए प्रतिनियुक्ति समाप्त होने पर कर्मचारी को मूल विभाग या शासन द्वारा निर्धारित पदस्थापना पर वापस भेजा जा सकता है, बशर्ते संबंधित कार्रवाई लागू नियमों और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप हो।

इस मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत कर्मचारी को संबंधित संस्थान में बने रहने का स्थायी या कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं होता। इस आधार पर अदालत ने राज्य शासन के आदेश और स्थानांतरण शिकायत निवारण समिति के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

यह निर्णय प्रतिनियुक्ति से जुड़े मामलों में प्रशासनिक अधिकारों और कर्मचारियों के दावों के बीच अंतर को रेखांकित करता है। हालांकि, प्रत्येक मामले में संबंधित सेवा नियमों, प्रतिनियुक्ति की शर्तों और शासन के आदेश की वैधता का महत्व बना रहता है।

स्थानांतरण शिकायत निवारण समिति ने पहले ही खारिज की थी शिकायत

प्रीति तिवारी ने हाई कोर्ट जाने से पहले वरिष्ठ सचिवों की स्थानांतरण शिकायत निवारण समिति के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत की थी। समिति ने 19 अगस्त 2026 को उनकी शिकायत खारिज कर दी थी। इसके बाद ही उन्होंने न्यायिक राहत पाने के लिए याचिका दायर की।

हाई कोर्ट ने मामले पर विचार करने के बाद शासन के आदेश और समिति के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इस तरह याचिकाकर्ता को अदालत से मांगी गई राहत नहीं मिल सकी।

इस फैसले में प्रतिनियुक्ति को स्थायी नियुक्ति से अलग व्यवस्था के रूप में समझने पर जोर दिया गया है। प्रतिनियुक्ति पर किसी पद पर कार्य करना अपने आप में उस पद पर स्थायी बने रहने का अधिकार नहीं देता। संबंधित कर्मचारी को शासन के आदेश और लागू सेवा नियमों के अनुसार ही कार्य करना होता है।

प्रशासनिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण निर्णय

प्रतिनियुक्ति सरकारी विभागों और संस्थानों में कर्मचारियों की उपलब्धता तथा प्रशासनिक जरूरतों को पूरा करने का एक माध्यम है। इसके तहत कर्मचारियों को एक संस्थान से दूसरे संस्थान में भेजा जाता है। लेकिन प्रतिनियुक्ति की अवधि समाप्त होने या शासन द्वारा उसे समाप्त किए जाने की स्थिति में कर्मचारी की पदस्थापना का निर्धारण संबंधित नियमों के अनुसार किया जाता है।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का यह निर्णय इसी कानूनी सिद्धांत को सामने लाता है कि प्रतिनियुक्ति पर काम करने वाले कर्मचारी को केवल उस आधार पर संबंधित संस्थान में बने रहने का स्थायी अधिकार नहीं मिल जाता।

निष्कर्षतः, जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने प्रीति तिवारी की याचिका पर राज्य शासन के आदेश और स्थानांतरण शिकायत निवारण समिति के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने प्रतिनियुक्ति को अस्थायी व्यवस्था बताते हुए स्पष्ट किया कि कर्मचारी को उधार लेने वाले विभाग या संस्थान में बने रहने का कोई स्थायी अथवा कानूनी अधिकार नहीं है।

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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