Mythological beliefs : पाकिस्तान से आए शरणार्थियों ने रांची में किया था पहला रावण दहन, जानें दशहरे से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं ?

Mythological beliefs : पाकिस्तान से आए शरणार्थियों ने रांची में किया था पहला रावण दहन, जानें दशहरे से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं ?
Mythological beliefs : पाकिस्तान से आए शरणार्थियों ने रांची में किया था पहला रावण दहन, जानें दशहरे से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं ?

नई दिल्ली ।

दशहरे पर रावण दहन सिर्फ एक पुतला जलाने की परंपरा नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। हर साल विजयादशमी के दिन देशभर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले जलाए जाते हैं, जो यह संदेश देते हैं कि अहंकार, अन्याय और बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अंत में सत्य और धर्म की ही जीत होती है। हिंदू धर्म ग्रंथों में दशहरा का पर्व मनाने को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। रामायण के अनुसार, त्रेतायुग में लंका के राजा रावण ने माता सीता का अपहरण कर लिया था। इसके बाद भगवान श्रीराम ने वानर सेना की सहायता से लंका पर चढ़ाई कर दी थी। युद्ध में रावण के भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद सहित कई योद्धा मारे गए। युद्ध के आखिरी में श्रीराम ने रावण का वध किया और सीता को मुक्त कराया। इसी विजय को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में देखा जाता है और दशहरे पर रावण दहन किया जाता है। हालांकि रावण दहन की परंपरा कब शुरू हुई, इसका सटीक ऐतिहासिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। रावण दहन की प्रथा अपेक्षाकृत नई है और भारत की स्वतंत्रता के बाद लोकप्रिय हुई। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, पहला रावण दहन 1948 में रांची में हुआ था और इसका आयोजन पाकिस्तान से आए शरणार्थियों द्वारा किया गया था। दिल्ली में पहला रावण दहन 1953 में रामलीला मैदान में हुआ था।

Mythological beliefs : पाकिस्तान से आए शरणार्थियों ने रांची में किया था पहला रावण दहन, जानें दशहरे से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं ?
Mythological beliefs : पाकिस्तान से आए शरणार्थियों ने रांची में किया था पहला रावण दहन, जानें दशहरे से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं ?

नागपुर में भी 1948 में 35 फुट ऊंचे रावण पुतला (पुतला) की स्थापना के साथ इस परंपरा की शुरुआत हुई थी। परंपरागत रूप से रावण का स्ट्रक्चर बांस, कपड़े, रस्सी और कागज से बनाया जाता है। वर्तमान में फाइबरग्लास जैसी आधुनिक सामग्रियों का भी उपयोग किया जाने लगा है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राक्षस महिषासुर ने अपने कठिन तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर उनसे वरदान मांग लिया था कि किसी मानव द्वारा उसकी मृत्यु न हो। वरदान मिलने के बाद महिषासुर ने तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। महिषासुर के आतंक से मुक्ति पाने के लिए देवताओं ने एक दिव्य शक्ति को प्रकट किया, जिसके हाथ में अस्त्र-शस्त्र थे और वह सिंह पर सवार थीं। आदि शक्ति ने 9 दिनों के युद्ध के बाद 10वें दिन महिषासुर का वध किया। इस दिन को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है।
दशहरे का सांस्कृतिक पहलू भी है। किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज घर लाता है तो उसमें उल्लास और उमंग रहता है। इस प्रसन्नता के अवसर पर वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उसका पूजन करता है।
इस बार 20 अक्टूबर को दशहरा या विजयादशमी पर्व मनाया जाएगा, हालांकि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 21 अक्टूबर की दोपहर तक रहने के कारण कुछ क्षेत्रों में पर्व की तारीख भिन्न हो सकती है।

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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