Organized gangs : बाल तस्करी पर नहीं लग रहा अंकुश, संगठित गिरोहों से मासूम बच्चों की सुरक्षा बनी चुनौती

तमाम दावों के बावजूद देश में बाल तस्करी पर अंकुश नहीं..!! संबंधित विभागों की प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त और जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक किसी भी तरह के अपराध पर अंकुश नहीं लग पाएगा..! ना जानें कितनी माओं के जिगर के टुकड़े युही बिछड़ते रहेंगे..!! सरकार के तमाम दावों के बावजूद देश में बाल तस्करी पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। इसका जाल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि सीमा पार तक फैला हुआ है। विभिन्न राज्यों में सक्रिय गिरोह छोटे बच्चों से लेकर नवजात शिशुओं का अपहरण करते हैं और बाद में उनकी खरीद-फरोख्त की जाती है। हैरत इस बात की है कि इन आपराधिक गतिविधियों में ऐसे लोगों के नाम भी सामने आ रहे हैं, जो लोगों का जीवन बचाने के पेशे से जुड़े हुए हैं।हालहि में देश की राजधानी के किसी अस्पताल में ही इस तरह की आपराधिक गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा था, तो दूसरे शहरों में कानून-व्यवस्था की स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है!सवाल है कि मानव तस्करी के खिलाफ सख्त कानून के बावजूद इससे जुड़े गिरोह आसानी से बच्चों का अपहरण कर उनकी खरीद-फरोख्त कैसे करते हैं? इसमें दोराय नहीं कि यह पुलिस व्यवस्था और निगरानी तंत्र की लापरवाही और कर्तव्य में कोताही का ही नतीजा है!सवाल यह भी कि दिल्ली पुलिस को इस गिरोह की भनक पहले क्यों नहीं लग पाई थी ?

क्या पुलिस का निगरानी एवं खुफिया तंत्र इतना कमजोर है कि उसे अस्पताल जैसे सार्वजनिक संस्थानों में चल रही आपराधिक गतिविधियों की भी जानकारी नहीं मिल पाती है? जाहिर है कि जब तक पुलिस प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त और जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक किसी भी तरह के अपराध पर अंकुश नहीं लग पाएगा।हमारे देश के कई जिलों के साथ अंतर्राष्ट्रीय सीमाएं जुड़ी हैं जिसमें मौजूद कमियां ऐसी स्थितियों को बढ़ावा देती हैं जो तस्करों को आकर्षित करती हैं और इस काम को करने में सक्षम बनाती हैं। बच्चे आसान लक्ष्य होते हैं जो अपने शिकार की तलाश में लगातार लगे इन शिकारियों के चंगुल में फंस जाते हैं। पीड़ित बच्चे शोषण के गंभीर रूपों , जैसे शारीरिक, यौन और भावनात्मक हिंसा, दुर्व्यवहार, यातना और सदमा, जबरन और बंधुआ मजदूरी, जबरन विवाह और दासता आदि का सामना करते हैं। बाल तस्करी के पीड़ितों द्वारा सामना की जाने वाली क्रूरता और अन्याय अक्सर समझ से भी परे है; इसमें उनका जीवन नष्ट हो जाता है जिसे सुधार पाना भी संभव नहीं होता; और वे अधिकारों से वंचित रहते हैं।इसकी रोकथाम के लिए सरकार को गम्भीर होकर सोचना होगा अन्यथा ना जानें कितनी माओं के जिगर के टुकड़े युही बिखरते रहेंगे..!!
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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