Cow urine : गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर, गोबर और गोमूत्र से बढ़ेंगे आय के नए स्रोत

दमोह। गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने और गोवंश संरक्षण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुक्रवार को तेंदूखेड़ा स्थित दयोदय गौशाला में जिला स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में जिले की विभिन्न गौशालाओं के संचालकों, जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और समाजसेवियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य गौशालाओं को केवल सहायता पर निर्भर न रखते हुए उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए नए आय स्रोत विकसित करना था।
कार्यक्रम में प्रदेश के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार लखन पटेल तथा संस्कृति, पर्यटन, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग के राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार धर्मेंद्र सिंह लोधी मुख्य रूप से उपस्थित रहे। दोनों मंत्रियों ने गौ संरक्षण, गौशालाओं के विकास और गोवंश आधारित उत्पादों के निर्माण को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
राज्यमंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी ने कहा कि प्रदेश सरकार गौसंरक्षण और गोसेवा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार गौमाता के भरण-पोषण के लिए प्रति गाय 1200 रुपये प्रतिमाह उपलब्ध करा रही है। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा जनकल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को सहायता प्रदान की जा रही है और गौशालाओं को भी बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि गौवंश की सेवा केवल धार्मिक भावना से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत किया जा सकता है। गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के अवसर विकसित किए जाने चाहिए।
राज्यमंत्री लखन पटेल ने कहा कि दमोह जिले में संचालित 56 गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ठोस प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने गौशाला संचालकों से अपील की कि वे गोबर और गोमूत्र से उपयोगी उत्पाद तैयार कर आय के नए साधन विकसित करें।
उन्होंने कहा कि गोबर से वर्मी कम्पोस्ट खाद, जैविक खाद तथा अन्य कृषि उपयोगी सामग्री बनाई जा सकती है। वहीं गोमूत्र से फिनाइल, जैविक उत्पाद, कीटनाशक और अन्य उपयोगी वस्तुओं का निर्माण किया जा सकता है। इन उत्पादों के निर्माण और बेहतर विपणन से गौशालाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और उन्हें सरकारी सहायता पर कम निर्भर रहना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि आज जैविक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में गौशालाएं अपने संसाधनों का बेहतर उपयोग कर न केवल आय अर्जित कर सकती हैं, बल्कि किसानों और समाज को भी लाभ पहुंचा सकती हैं। उन्होंने गौशाला संचालकों से उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने और उनके प्रचार-प्रसार पर विशेष ध्यान देने का आह्वान किया।
कार्यशाला में आनंदधाम के पीठाधीश्वर रंजीतानंद स्वामी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गौमाता का विशेष स्थान रहा है। उन्होंने कहा कि स्वार्थवश गोवंश को सड़कों पर छोड़ देना गंभीर समस्या है। प्रत्येक व्यक्ति को गौ संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए और इसके लिए सकारात्मक प्रयास करने चाहिए।
स्वामी अखलेंद्रनाथ ने कहा कि यदि प्रत्येक परिवार एक गौमाता के पालन का संकल्प ले तो निराश्रित गौवंश की समस्या काफी हद तक समाप्त हो सकती है। उन्होंने कहा कि समाज के सहयोग से ही गौ संरक्षण अभियान को सफल बनाया जा सकता है।
कार्यशाला के दौरान गौशाला संचालकों ने अपने अनुभव साझा किए और गौशालाओं के संचालन से जुड़ी समस्याओं एवं सुझावों को सामने रखा। विशेषज्ञों और अतिथियों ने गौशालाओं को बेहतर तरीके से संचालित करने, उत्पाद निर्माण और उनके विपणन की संभावनाओं पर चर्चा की।
कार्यक्रम में नगर परिषद अध्यक्ष सुरेशचंद जैन, उपाध्यक्ष लक्ष्मी नामदेव, ठाकुर मूरत सिंह, भारत सिंह लोधी, नीतू साहू, रश्मि साहू, गोविंद यादव, वीरेंद्र आचार्य, डॉ. परम सिंह लोधी, शुभम जैन सहित अन्य जनप्रतिनिधि, गौशाला समिति के अध्यक्ष संजय जैन, समिति के पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे।
इस अवसर पर मीडिया प्रतिनिधि भी मौजूद रहे। कार्यशाला का उद्देश्य गौशालाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना, गोवंश संरक्षण को बढ़ावा देना और गोबर एवं गोमूत्र आधारित उत्पादों के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना रहा। आयोजन में यह संदेश दिया गया कि गौशालाएं यदि आधुनिक प्रबंधन और व्यवसायिक दृष्टिकोण अपनाएं तो वे आत्मनिर्भर बनने के साथ समाज और पर्यावरण के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती हैं।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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