Transparent accounting : आईएएस अफसरों की संपत्ति का ब्योरा: पारदर्शी हिसाब या नौकरशाही का ढोंग ?

Transparent accounting : आईएएस अफसरों की संपत्ति का ब्योरा: पारदर्शी हिसाब या नौकरशाही का ढोंग ?
Transparent accounting : आईएएस अफसरों की संपत्ति का ब्योरा: पारदर्शी हिसाब या नौकरशाही का ढोंग ?

 जयपुर।

हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था का ढर्रा भी बड़ा विचित्र है। जो नौकरशाह जनता को ईमानदारी, नियमों और पारदर्शिता का पाठ पढ़ाते हैं, जब बात खुद की तिजोरियों और हवेलियों का हिसाब देने की आती है, तो वे शब्दों की ऐसी चाशनी लपेटते हैं कि सच का सिर चकरा जाए। मामला राजस्थान का है, जहां देश की सर्वोच्च सेवा यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारियों की वर्ष 2025 की अचल संपत्ति विवरणियों (आईपीआर) को देखकर यह समझ पाना मुश्किल हो गया है कि यह देश के नीति-नियंताओं का प्रामाणिक घोषणा-पत्र है या कार्मिक विभाग (डीओपी) की आंखों में धूल झोंकने की सुनियोजित कागजी खानापूर्ति!
जब नौकरशाही से पूछा गया कि आपकी मिल्कियत की मौजूदा कीमत क्या है, तो बड़े ठाट से लिख दिया—‘As per DLC rate’। जब पूछा गया कि संपत्ति से सालाना आमदनी कितनी होती है, तो लिख दिया—मासिक किराया। आखिर यह क्या तमाशा है? सवाल केवल इन साहबों की संपत्तियों का नहीं है, सवाल राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग (डीओपी) की उस आपराधिक चुप्पी और ढिलाई का भी है, जो ऐसी लफ्फाजियों को बिना किसी जांच-पड़ताल के चुपचाप अपनी दराजों में दबाकर बैठ जाता है।
मूल्य के नाम पर तीन अंग्रेजी शब्द: ‘As per DLC rate’ का गोरखधंधा
अचल संपत्ति विवरणी के प्रपत्र में एक स्पष्ट खाना (कॉलम) होता है—‘Present Value’ यानी वर्तमान मूल्य। इसका सीधा सा आशय यह है कि अधिकारी अपनी मिल्कियत का एक सटीक संख्यात्मक आंकलन दर्ज करे, ताकि देश और प्रदेश की जनता जान सके कि जिस बंगले, जमीन या फ्लैट पर साहब काबिज हैं, उसकी कीमत बीस लाख है, दो करोड़ है या बीस करोड़!
लेकिन हमारे चतुर साहबों ने इस खाने में केवल तीन लफ्ज टांक दिए—‘As per DLC rate’। क्या सरकारी मूल्यांकन की दर का नाम लिख देने से संपत्ति का दाम तय हो जाता है? यदि आपने डीएलसी दर के हिसाब से ही मूल्यांकन किया है, तो जमीन का क्षेत्रफल, उस क्षेत्र की तयशुदा दर, मूल्यांकन की तारीख और गुणा-गणित का ब्योरा क्यों गायब है? क्या एक साधारण बाबू या आम नागरिक ऐसी आधी-अधूरी जानकारी देकर बच सकता था? बिल्कुल नहीं। फिर इन बड़े साहबों को केवल तीन अंग्रेजी शब्द लिखकर अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ लेने की छूट किस कानून के तहत दी गई?
सालाना आय पूछी तो बताया मासिक किराया: यह कैसी चालाकी?
अस्पष्टता का यह खेल यहीं खत्म नहीं होता। विवरणी में एक अन्य स्पष्ट कॉलम है—‘Annual Income from Property’, यानी संबंधित संपत्ति से वर्षभर में अर्जित कुल आमदनी।
मगर साहबों का अंदाज देखिए! विवरणी में दर्ज किया गया कि एक फ्लैट से 25,000 रुपये प्रतिमाह और दूसरी मिल्कियत से 1,80,000 रुपये प्रतिमाह का किराया आता है। यदि थोड़ा सा भी हिसाब लगाया जाए, तो इन दोनों संपत्तियों से होने वाली संयुक्त वार्षिक आय 24 लाख 60 हजार रुपये बैठती है। जब फॉर्म में साफ-साफ ‘सालाना आय’ मांगी गई है, तो मासिक किराए का झुनझुना क्यों पकड़ाया जा रहा है? क्या कार्मिक विभाग का काम सिर्फ आंख मूंदकर फाइलें जमा करना है या उसका कोई दायित्व यह देखने का भी है कि जानकारी नियमों के अनुरूप भरी गई है या नहीं?
न जमीन का नाप, न बेचने वाले का नाम: किसके रहमो-करम पर है यह तंत्र?
संपत्ति कहां स्थित है, उसका क्षेत्रफल कितना है, रजिस्ट्री की तारीख क्या है और वह किससे खरीदी गई—फॉर्म में यह सब कुछ तफ्सील से पूछा जाता है। लेकिन राजस्थान के एक मामले की जांच में जो सामने आया, वह और भी चौंकाने वाला है। कई संपत्तियों का क्षेत्रफल ही नदारद है। खरीद का साल तो लिख दिया गया, लेकिन अधिग्रहण की तारीख और विक्रेता का नाम गोल कर दिया गया।
केवल ‘Land’, ‘Flat’ और ‘Purchase’ लिख देने से क्या संपत्ति की शिनाख्त हो जाती है? जब मूल दस्तावेज में ही विक्रेता और क्षेत्रफल का अता-पता नहीं होगा, तो विभाग यह कैसे जांचेगा कि यह सौदा वैध था या बेनामी? क्या यह केवल फॉर्म भरने में बरती गई लापरवाही है या फिर संपत्ति के असली स्रोतों पर पर्दा डालने की कोई सोची-समझी बाजीगरी? बेशक, केवल अधूरी जानकारी से किसी को सीधे दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन दाल में कुछ काला है या पूरी दाल ही काली है—इसकी तह तक जाना किसका काम है?

Transparent accounting : आईएएस अफसरों की संपत्ति का ब्योरा: पारदर्शी हिसाब या नौकरशाही का ढोंग ?
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कानून में चाबुक चलाने का पूरा अधिकार, फिर कार्मिक विभाग लाचार क्यों?
हैरत की बात यह है कि नियम-कायदों की कोई कमी नहीं है। ऑल इंडिया सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स, 1968 के नियम 16(2) के तहत प्रत्येक अधिकारी के लिए अपनी अचल संपत्ति का वार्षिक ब्योरा देना अनिवार्य है। इससे भी आगे, नियम 16(5) सरकार या अधिकृत प्राधिकारी को यह खुला अधिकार देता है कि वह किसी भी समय किसी भी अधिकारी से संपत्ति का संपूर्ण विवरण और उसे खरीदने में लगाए गए धन के स्रोत (Source of Funds) का हिसाब मांग सकती है।
जब कानून के हाथ इतने लंबे हैं, तो फिर राजस्थान का कार्मिक विभाग हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठा है? क्या डीओपी के पास इन विवरणियों की पड़ताल करने की फुर्सत नहीं है या फिर बड़े अफसरों के रसूख के आगे विभाग ने अपने घुटने टेक दिए हैं?
डीओपी के कठघरे में सात तीखे सवाल
व्यवस्था के इस ढुलमुल रवैये को लेकर कार्मिक विभाग के सामने ये सात सीधे सवाल खड़े होते हैं:
क्या आईएएस अधिकारियों की संपत्ति विवरणी जमा होने के बाद उसके प्रत्येक अनिवार्य कॉलम की जांच की जाती है?
क्या ‘Present Value’ के कॉलम में सिर्फ ‘As per DLC rate’ लिख देना विभाग के नियमों के अनुसार जायज है?
सालाना आय की जगह सिर्फ मासिक किराया लिख देने को क्या पूर्ण विवरण माना जा सकता है?
जिन संपत्तियों का क्षेत्रफल, पूरा पता, विक्रेता का नाम या खरीद की तारीख दर्ज नहीं है, क्या उनसे कोई स्पष्टीकरण मांगा गया?
वर्ष 2025 की विवरणियों में कितने आईएएस अधिकारियों के फॉर्म अधूरे या त्रुटिपूर्ण पाए गए?
क्या डीओपी ने कंडक्ट रूल्स के नियम 16(5) का इस्तेमाल करते हुए कभी किसी अधिकारी से संपत्ति के स्रोत और वास्तविक मूल्य का अतिरिक्त हिसाब मांगा?
क्या विभाग के पास इन फार्मों की जांच के लिए कोई तयशुदा चेकलिस्ट, पारदर्शी प्रक्रिया या कोई जिम्मेदार अधिकारी नियुक्त है?
कागजी खानापूर्ति बंद हो, जवाबदेही तय हो
केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ने साफ हिदायत दे रखी है कि समय पर संपत्ति विवरणी न देने वाले अधिकारियों की विजिलेंस क्लीयरेंस रोकी जा सकती है। लेकिन सवाल यह है कि यदि कोई अधिकारी समय पर अधूरा, भ्रामक और अस्पष्ट फॉर्म भरकर जमा करा दे, तो क्या उसे स्वीकार कर लिया जाना चाहिए?
राजस्थान सरकार को चाहिए कि वह वर्ष 2025 की सभी आईएएस संपत्ति विवरणियों की उच्चस्तरीय समीक्षा करवाए। जिन अधिकारियों ने कॉलम अधूरे छोड़े हैं, उनसे तत्काल जवाब-तलब किया जाए और संशोधित ब्योरा सार्वजनिक कराया जाए।
जो नौकरशाह पूरे जिले की तकदीर का फैसला करते हैं, करोड़ों के बजट और भूमि आवंटन की फाइलें निपटाते हैं, यदि वे अपनी निजी संपत्ति के एक पन्ने के फॉर्म को भी ईमानदारी से नहीं भर सकते, तो फिर आम आदमी इस व्यवस्था की शुचिता पर कैसे यकीन करे? कानून केवल कागजों में शोभा बढ़ाने के लिए नहीं होते, उन पर अमल दिखना चाहिए। खास खबर का यही सीधा सवाल है—क्या हुकूमत इन बड़े अफसरों से नियमों का पालन करवाएगी या यह तमाशा यूं ही चलता रहेगा?

News Editor- (Jyoti Parjapati)

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