Riyazuddin Mansoori : होटल अग्निकांड में जान बचाने वाले रियाज़ुद्दीन मंसूरी ने फिर जीता दिल, मदद से किया इनकार

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में हुए एक होटल अग्निकांड के दौरान अपनी बहादुरी और सूझबूझ से करीब एक दर्जन लोगों की जान बचाने वाले रियाज़ुद्दीन मंसूरी एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह उनकी वीरता नहीं, बल्कि उनका विनम्र और आत्मसम्मान से भरा वह निर्णय है, जिसमें उन्होंने समाज द्वारा दी जा रही अतिरिक्त आर्थिक सहायता को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है।
घटना उस समय की है जब मालवीय नगर स्थित एक होटल में अचानक भीषण आग लग गई थी। आग इतनी तेजी से फैली कि होटल में मौजूद लोग घबरा गए और बाहर निकलने के सभी रास्ते लगभग बंद हो गए थे। उसी समय पास ही रजाई-गद्दों की दुकान चलाने वाले रियाज़ुद्दीन मंसूरी ने बिना किसी देरी के स्थिति को समझा और अपनी सूझबूझ से एक ऐसा कदम उठाया, जिसने कई जिंदगियों को बचा लिया।
रियाज़ुद्दीन मंसूरी पहले सिविल डिफेंस से जुड़े रहे हैं और उन्हें आपदा प्रबंधन तथा आपातकालीन स्थितियों में बचाव कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त है। इसी प्रशिक्षण और अनुभव का उपयोग करते हुए उन्होंने तुरंत अपनी दुकान के सभी गद्दे और रजाइयां सड़क पर बिछा दीं। इसके बाद होटल की खिड़कियों और बालकनी में फंसे लोगों ने जान बचाने के लिए उन्हीं गद्दों पर छलांग लगाई। इस त्वरित निर्णय ने लगभग एक दर्जन लोगों की जान बचा ली।
हालांकि इस साहसी प्रयास में रियाज़ुद्दीन को भारी आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा। उनकी दुकान का बड़ा हिस्सा जल गया और रजाई-गद्दों का स्टॉक पूरी तरह से नष्ट हो गया, जिससे लाखों रुपये का नुकसान हुआ। लेकिन उन्होंने उस समय किसी भी प्रकार की हिचकिचाहट नहीं दिखाई और सबसे पहले इंसानी जान बचाने को प्राथमिकता दी।
घटना के बाद स्थानीय लोगों, सामाजिक संगठनों और कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने उनकी मदद के लिए पहल की। कई लोगों ने मिलकर आर्थिक सहायता जुटाई और यह राशि रियाज़ुद्दीन मंसूरी तक पहुंचाई गई। समाज के विभिन्न वर्गों से उन्हें सराहना और सम्मान भी मिला। लोग उनकी इस बहादुरी को “मानवता की मिसाल” के रूप में देख रहे हैं।
लेकिन अब रियाज़ुद्दीन मंसूरी ने एक बार फिर अपने विनम्र स्वभाव से सभी का दिल जीत लिया है। उन्होंने अपील की है कि अब उनके बैंक खाते में कोई अतिरिक्त आर्थिक सहायता न भेजी जाए, क्योंकि उनके दुकान के नुकसान की भरपाई पहले ही काफी हद तक हो चुकी है। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य कभी आर्थिक लाभ नहीं था, बल्कि उन्होंने जो भी किया वह केवल इंसानियत के लिए किया।
रियाज़ुद्दीन मंसूरी का यह बयान सोशल मीडिया और आम लोगों के बीच तेजी से वायरल हो गया है। लोग उनकी ईमानदारी, सादगी और निस्वार्थ भावना की जमकर सराहना कर रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि आज के समय में जब अक्सर लोग मदद के नाम पर लाभ की अपेक्षा रखते हैं, ऐसे में रियाज़ुद्दीन का यह निर्णय असाधारण और प्रेरणादायक है।
उनकी यह अपील केवल आर्थिक सहायता से इनकार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के लिए एक बड़ा संदेश भी है कि सच्ची मानवता बिना किसी स्वार्थ के होती है। उन्होंने यह साबित किया कि इंसानियत की सेवा का कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता।

घटना के बाद से रियाज़ुद्दीन मंसूरी को कई सामाजिक संगठनों और संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी किया गया है। कुछ संगठनों ने उन्हें “मानवता का सच्चा सिपाही” कहा है, जबकि कई लोगों ने उनकी तुलना वास्तविक जीवन के नायकों से की है। उनका कहना है कि वे इस सम्मान को स्वीकार करते हैं, लेकिन किसी भी प्रकार की अतिरिक्त आर्थिक सहायता नहीं लेना चाहते।
इस पूरे मामले में सबसे खास बात यह रही कि रियाज़ुद्दीन ने न केवल लोगों की जान बचाई, बल्कि बाद में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनका मानना है कि यदि किसी ने समाज की मदद की है, तो उसका उद्देश्य केवल सेवा होना चाहिए, न कि लाभ।
स्थानीय लोगों के अनुसार, रियाज़ुद्दीन हमेशा से ही मिलनसार और मददगार स्वभाव के रहे हैं। आपदा की उस घड़ी में उन्होंने जिस तरह से साहस और समझदारी का परिचय दिया, उसने उन्हें पूरे क्षेत्र में एक नायक के रूप में स्थापित कर दिया है।
कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार को ऐसे व्यक्तित्वों को विशेष रूप से सम्मानित करना चाहिए, ताकि समाज में प्रेरणा का वातावरण बने। उनका मानना है कि ऐसे लोग समाज के असली नायक होते हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की जान बचाने के लिए आगे आते हैं।
हालांकि इस मामले में अब एक नई चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या ऐसे नायकों को औपचारिक रूप से सरकारी स्तर पर सम्मान और सहायता मिलनी चाहिए। कई लोग मानते हैं कि रियाज़ुद्दीन जैसे व्यक्तित्व समाज के लिए प्रेरणा हैं और उन्हें उचित पहचान मिलनी चाहिए।
रियाज़ुद्दीन मंसूरी की कहानी केवल एक अग्निकांड में बचाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवता, त्याग और निस्वार्थ सेवा का जीवंत उदाहरण बन चुकी है। उनकी सादगी और उनका निर्णय यह दर्शाता है कि सच्ची महानता किसी पद या पहचान में नहीं, बल्कि कर्म और भावना में होती है।
आज जब उनकी सहायता से इनकार करने की अपील सामने आई है, तो यह केवल एक बयान नहीं बल्कि एक नैतिक संदेश बन गया है। यह संदेश है कि सच्चा इंसान वही है जो दूसरों की मदद बिना किसी अपेक्षा के करता है और जब समाज उसे सम्मान देता है, तो वह विनम्रता के साथ उसे स्वीकार करता है लेकिन लाभ की सीमा तय करता है।
रियाज़ुद्दीन मंसूरी की यह कहानी आने वाले समय में भी लोगों को प्रेरित करती रहेगी और यह याद दिलाती रहेगी कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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