An appeal to the residents of the district : वृक्षारोपण दिवस पर नहीं, वृक्षों के प्रति संवेदनशीलता पर जोर: समाजसेवी सुमित शुक्ला की जनपदवासियों से अपील

बांदा। समाजसेवी सुमित शुक्ला ने जनपदवासियों से अपील करते हुए कहा है कि केवल वृक्षारोपण दिवस मनाने या पौधारोपण की औपचारिक तस्वीरें खिंचवाने से वातावरण और वायुमंडल में वास्तविक सुधार संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि वास्तविक परिवर्तन तब आएगा जब समाज वृक्षों के प्रति सद्भाव, जिम्मेदारी और निरंतर देखभाल की भावना को अपनाएगा।
सुमित शुक्ला ने कहा कि हर वर्ष पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर बड़े पैमाने पर पौधारोपण के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और कई वरिष्ठ लोग पौधे लगाते हुए तस्वीरें भी साझा करते हैं, लेकिन कुछ समय बाद अधिकतर लोग यह तक भूल जाते हैं कि उन्होंने पौधा कहां लगाया था। उन्होंने इस प्रवृत्ति को पर्यावरण संरक्षण के लिए एक गंभीर चुनौती बताया।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में बांदा क्षेत्र भीषण गर्मी और जलवायु परिवर्तन की समस्याओं से जूझ रहा है। तपते हुए मौसम और बढ़ते तापमान को देखते हुए यह समझा जा सकता है कि आने वाली पीढ़ियों को कितनी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। यदि आज ही गंभीरता से कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में स्थिति और अधिक चिंताजनक हो सकती है, जहां गर्मियों में कूलर और एसी भी पर्याप्त राहत नहीं दे पाएंगे।
समाजसेवी ने कहा कि जंगलों का लगातार खत्म होना, पहाड़ों का कटान और प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन पर्यावरण असंतुलन के प्रमुख कारण हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अब केवल पौधे लगाने की नहीं, बल्कि उन्हें वृक्ष बनने तक संरक्षित करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि पहले के लोग पौधारोपण को केवल एक कार्यक्रम नहीं मानते थे, बल्कि उसे एक दायित्व की तरह निभाते थे। वे लगाए गए पौधों की तब तक देखभाल करते थे जब तक वे पूर्ण रूप से वृक्ष का रूप नहीं ले लेते थे। उस समय लोगों में भले ही आधुनिक शिक्षा कम रही हो, लेकिन उनका सामाजिक और प्राकृतिक ज्ञान अधिक मजबूत था, जिससे वे वृक्षों के महत्व को गहराई से समझते थे।
सुमित शुक्ला ने सुझाव दिया कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि वे प्रत्येक व्यक्ति तक कम से कम एक से पांच पौधे सीधे उनके घर तक पहुंचाएं। इससे लोगों में उन पौधों के प्रति अपनत्व की भावना विकसित होगी और वे स्वयं उनकी देखभाल करेंगे। उन्होंने कहा कि केवल बड़े पैमाने पर पौधारोपण कर देने से काम पूरा नहीं होता, बल्कि उनकी सुरक्षा और संवर्धन भी उतना ही आवश्यक है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि एक व्यक्ति, प्रशासन या राजनेता द्वारा लाखों पौधे रोपे जाएं लेकिन उनकी देखभाल न हो, तो वे पौधे धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं। उन्होंने इस स्थिति की तुलना अत्यंत संवेदनशील उदाहरण से करते हुए कहा कि यह गर्भ में शिशु की उपेक्षा के समान है, जहां जीवन की संभावना होते हुए भी उसे संरक्षण नहीं मिल पाता।
समाजसेवी ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में यदि लोगों को पौधे उपलब्ध कराए जाएं और उन्हें उनकी जिम्मेदारी दी जाए, तो उनमें वृक्षों के प्रति आत्मीयता और जागरूकता बढ़ेगी। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा, बल्कि समाज में प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना भी मजबूत होगी।
उन्होंने सभी नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, मीडिया कर्मियों और समाजसेवियों से मिलकर इस अभियान को जनआंदोलन बनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि वृक्षारोपण केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवनभर की जिम्मेदारी है।
अंत में उन्होंने कहा कि यदि हम आज वृक्षों के संरक्षण की दिशा में गंभीरता से कार्य करेंगे, तभी आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ, सुरक्षित और संतुलित पर्यावरण प्रदान कर सकेंगे।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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