Can deliver : डीआरडीओ का दुर्गा लेजर प्रोजेक्ट भारत को वैश्विक रक्षा तकनीक के शीर्ष क्लब में पहुंचा सकता

भारत तेजी से उन्नत सैन्य तकनीकों की दिशा में आगे बढ़ रहा है
और इसी क्रम में एक अत्याधुनिक लेजर हथियार प्रणाली के विकास की खबर ने वैश्विक स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित किया जा रहा दुर्गा (DURGA-2) प्रोजेक्ट भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल कर सकता है, जिनके पास डायरेक्टेड एनर्जी वेपंस (Directed Energy Weapons) यानी लेजर आधारित हथियार मौजूद हैं। यदि यह परियोजना सफल होती है, तो भारत अमेरिका, चीन और इजरायल जैसे देशों के विशेष रक्षा तकनीकी क्लब में शामिल हो जाएगा।
इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है 100 किलोवाट क्षमता वाला लेजर हथियार, जिसे दुर्गा-2 प्रोग्राम के तहत विकसित किया जा रहा है। यह हथियार प्रकाश की उच्च ऊर्जा किरणों का उपयोग करके लक्ष्य को नष्ट करने में सक्षम होगा। पारंपरिक हथियारों की तुलना में यह प्रणाली अधिक सटीक, तेज और कम लागत वाली मानी जाती है, क्योंकि इसमें बार-बार गोला-बारूद की आवश्यकता नहीं होती।
डायरेक्टेड एनर्जी वेपंस की खासियत यह है कि ये लक्ष्य पर लगभग तत्काल प्रभाव डालते हैं। जैसे ही लेजर बीम किसी ड्रोन, मिसाइल या अन्य लक्ष्य पर केंद्रित की जाती है, वह उसे अत्यधिक तापमान के कारण निष्क्रिय या नष्ट कर सकती है। यह तकनीक विशेष रूप से ड्रोन हमलों और मिसाइल खतरों से निपटने के लिए बेहद प्रभावी मानी जाती है।
भारत के लिए इस तकनीक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि हाल के वर्षों में ड्रोन आधारित हमलों का खतरा तेजी से बढ़ा है। मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पाकिस्तान की ओर से आने वाले चीनी तकनीक से लैस ड्रोन को सफलतापूर्वक नष्ट किया था। इस ऑपरेशन ने यह स्पष्ट कर दिया कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन और स्वायत्त हथियारों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होगी।
इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए डीआरडीओ ने अपनी अनुसंधान और विकास गतिविधियों को और तेज कर दिया है। दुर्गा-2 प्रोजेक्ट इसी दिशा में एक बड़ा कदम है, जिसका उद्देश्य भारत की वायु रक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाना है। यह लेजर हथियार न केवल दुश्मन के ड्रोन और मिसाइलों को रोकने में सक्षम होगा, बल्कि यह सीमित समय में कई लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता भी रखेगा।
इस तकनीक की एक और बड़ी विशेषता इसकी लागत-प्रभावशीलता है। पारंपरिक मिसाइल प्रणाली में हर एक इंटरसेप्टर मिसाइल की लागत काफी अधिक होती है, जबकि लेजर हथियार में एक बार सिस्टम तैयार हो जाने के बाद प्रति शॉट की लागत बेहद कम हो जाती है। इससे लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों में आर्थिक दबाव कम किया जा सकता है।
हालांकि, इस तकनीक के विकास में कई चुनौतियां भी हैं। उच्च ऊर्जा लेजर को स्थिर और सटीक बनाए रखना, मौसम की परिस्थितियों जैसे धूल, धुंध या बारिश के प्रभाव को कम करना, और ऊर्जा आपूर्ति को लगातार बनाए रखना—ये सभी तकनीकी पहलू हैं, जिन पर गहन शोध की आवश्यकता होती है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन इन सभी चुनौतियों पर काम कर रहा है और परीक्षण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

यदि भारत इस 100 किलोवाट लेजर हथियार का सफल परीक्षण कर लेता है,
तो यह न केवल तकनीकी उपलब्धि होगी, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी एक बड़ा कदम होगा। इससे भारत की रक्षा क्षमताओं में गुणात्मक वृद्धि होगी और वह भविष्य के युद्धों के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकेगा।
वैश्विक स्तर पर भी इस तकनीक का महत्व बढ़ता जा रहा है। अमेरिका पहले से ही लेजर हथियारों का परीक्षण और सीमित उपयोग कर रहा है, वहीं इजरायल ने अपनी आयरन बीम प्रणाली के माध्यम से इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। चीन भी इस तकनीक में तेजी से निवेश कर रहा है। ऐसे में भारत का इस दिशा में आगे बढ़ना वैश्विक शक्ति संतुलन में उसकी स्थिति को और मजबूत करेगा।
भारत की रक्षा नीति में आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर दिया जा रहा है, जिसे “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसी पहल के माध्यम से बढ़ावा दिया जा रहा है। दुर्गा-2 प्रोजेक्ट इसी नीति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जहां देश के वैज्ञानिक और इंजीनियर स्वदेशी तकनीक के माध्यम से अत्याधुनिक हथियार प्रणाली विकसित कर रहे हैं।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि डीआरडीओ का दुर्गा लेजर प्रोजेक्ट भारत के रक्षा क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। यह न केवल देश की सैन्य शक्ति को बढ़ाएगा, बल्कि उसे वैश्विक स्तर पर तकनीकी रूप से अग्रणी देशों की श्रेणी में भी स्थापित करेगा। आने वाले समय में इस परियोजना के परीक्षण और उसके परिणामों पर पूरे विश्व की नजरें टिकी रहेंगी, क्योंकि यह भविष्य के युद्धों की दिशा तय करने वाली तकनीकों में से एक मानी जा रही है।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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