Forbidden effects : 24 फरवरी से शुरू होगा होलाष्टक, शुभ कार्यों में रहेगा वर्जित प्रभाव

नई दिल्ली।
हिंदू धर्म में होली का पर्व अपने रंग, उल्लास और उत्सव के लिए जाना जाता है। यह त्यौहार प्रेम, भाईचारा और सामाजिक मेल-जोल का प्रतीक है। होली की तैयारियों का आरंभ कई दिनों पहले से ही लोगों द्वारा शुरू कर दिया जाता है। लेकिन होली के उत्सव से ठीक आठ दिन पहले एक धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण अवधि ‘होलाष्टक’ आरंभ हो जाती है। इस समय को ज्योतिष शास्त्र में अत्यंत संवेदनशील माना गया है।
होलाष्टक की अवधि में धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार शुभ कार्यों, नए निवेश, महत्वपूर्ण निर्णय, यात्रा और मांगलिक कार्यों को करने से परहेज करने की सलाह दी जाती है। इस अवधि में गुस्सा, द्वेष और अधैर्य जैसी नकारात्मक भावनाएं बढ़ने की संभावना अधिक होती हैं। इसलिए इस समय को शांतिपूर्ण, संयमित और आध्यात्मिक गतिविधियों में लगाने की परंपरा रही है।
वर्ष 2026 में फाल्गुन माह की शुरुआत 2 फरवरी से हो रही है, और इसके अनुसार होलाष्टक का आरंभ 24 फरवरी 2026 से होगा। होलाष्टक का अंत होली के ठीक एक दिन पहले यानी पूरा आठ दिन तक चलने के बाद 2 मार्च 2026 को हो जाएगा। इस अवधि में हिन्दू धर्म शास्त्रों में यह कहा गया है कि कोई भी नये कार्य शुरू न करें और केवल पूर्व निर्धारित और आवश्यक कार्यों पर ही ध्यान दें।
होलाष्टक का धार्मिक महत्व
होलाष्टक का उल्लेख विभिन्न पुराणों और ज्योतिष शास्त्रों में मिलता है। इसे विशेष रूप से ‘अशुभ काल’ के रूप में जाना जाता है। इस अवधि में शिव-पार्वती, विष्णु और अन्य देवी-देवताओं की विशेष पूजा करने की सलाह दी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस समय होली से संबंधित किसी भी प्रकार के अहितकारी क्रियाकलाप या अनुचित व्यवहार से बचना चाहिए।
पुराणों में वर्णित है कि होलाष्टक के आठ दिन ऐसे होते हैं जब दैवीय शक्तियों का असर अधिक होता है और व्यक्ति के कर्मों का प्रतिफल जल्दी मिलता है। इसलिए इस अवधि में धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में वृद्धि करने की परंपरा रही है।
होलाष्टक के दौरान वर्जित कार्य
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शुभ कार्यों का आरंभ न करना: इस समय नए व्यापार, निवेश, विवाह, गृह प्रवेश जैसे कार्य टालने की सलाह दी जाती है।
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यात्रा से परहेज: लंबी यात्राओं से बचना चाहिए क्योंकि इस समय राहु और केतु के प्रभाव अधिक सक्रिय माने जाते हैं।
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विवाद और तनाव से दूरी: गुस्सा और तनाव बढ़ने की संभावना के कारण इस अवधि में शांति और संयम का पालन करना आवश्यक है।
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सांस्कृतिक और मनोरंजन कार्यक्रमों में संयम: होलाष्टक के दौरान बड़े सामाजिक कार्यक्रम या उत्सव आयोजित करने की सलाह नहीं दी जाती।

Forbidden effects : 24 फरवरी से शुरू होगा होलाष्टक, शुभ कार्यों में रहेगा वर्जित प्रभाव
होली और होलाष्टक का संबंध
होलाष्टक और होली के बीच गहरा संबंध है। जबकि होली रंगों, मिठाइयों और उत्सव का प्रतीक है, होलाष्टक एक चेतावनी और संयम का समय है। यह हमें याद दिलाता है कि आनंद और उल्लास से पहले धर्म, संयम और विवेक का पालन करना आवश्यक है। इस प्रकार, होलाष्टक का समय मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संतुलन बनाए रखने का अवसर देता है।
2026 में होलाष्टक का समय-सारणी
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आरंभ: 24 फरवरी 2026
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समापन: 2 मार्च 2026
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कुल अवधि: 8 दिन
विशेषज्ञों का कहना है कि इस अवधि में लोग अपने घरों में धार्मिक अनुष्ठान, ध्यान, पूजा और साधना में अधिक समय व्यतीत करें। बच्चों को इस समय खेल-कूद और सामाजिक उत्सवों के बारे में सावधानीपूर्वक समझाना भी आवश्यक है।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, होलाष्टक में राहु और केतु ग्रह विशेष रूप से सक्रिय होते हैं। यह समय विवाद, असहजता और मानसिक तनाव लाने वाला माना जाता है। इसलिए व्यक्ति को इस अवधि में अपने व्यवहार, बोलचाल और कार्यों में संयम रखना चाहिए। यह समय पुराने कर्मों के परिणाम देखने और आत्म-विश्लेषण करने का भी आदर्श समय है।
निष्कर्ष
होलाष्टक एक धार्मिक और ज्योतिषीय चेतावनी का समय है। यह हमें याद दिलाता है कि आनंद और उत्सव से पहले संयम, विवेक और आध्यात्मिक जागरूकता का पालन आवश्यक है। वर्ष 2026 में होलाष्टक 24 फरवरी से शुरू होकर 2 मार्च तक चलेगा, और इस दौरान धार्मिक नियमों और परंपराओं का पालन कर हम अपने जीवन को संतुलित, शांतिपूर्ण और समृद्ध बना सकते हैं।
होलाष्टक का उद्देश्य केवल वर्जित कार्यों से बचाना नहीं है, बल्कि यह हमें आध्यात्मिक जागरूकता, सामाजिक जिम्मेदारी और मानसिक शांति की ओर अग्रसर करता है। इस प्रकार, होलाष्टक और होली मिलकर जीवन में संतुलन, उल्लास और आध्यात्मिक चेतना का संदेश देते हैं।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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