Allegations of indiscipline : रील बनाने के शौकीन प्रधान आरक्षक विवेकानंद तिवारी निलंबित, ड्यूटी में लापरवाही और अनुशासनहीनता के आरोप

शहडोल। मध्य प्रदेश पुलिस के शहडोल यातायात विभाग में पदस्थ प्रधान आरक्षक विवेकानंद तिवारी को सोशल मीडिया गतिविधियों और ड्यूटी में लापरवाही के आरोपों के चलते पुलिस अधीक्षक द्वारा निलंबित कर दिया गया है। यह कार्रवाई उस समय की गई जब उनके विरुद्ध लंबे समय से ड्यूटी से अनुपस्थित रहने और विभागीय अनुशासन का उल्लंघन करने की शिकायतें प्राप्त हो रही थीं।
प्रधान आरक्षक विवेकानंद तिवारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर अपनी रील्स और वीडियो के कारण काफी चर्चित रहे हैं। वे अक्सर यातायात व्यवस्था से जुड़े वीडियो बनाते हुए लोगों को रोचक अंदाज में ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूक करते नजर आते थे। उनकी शैली और संवाद का तरीका सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हुआ था और कई वीडियो वायरल भी हुए थे।
हालांकि, विभागीय जांच में यह बात सामने आई कि लगातार सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने के कारण उनकी ड्यूटी पर उपस्थिति प्रभावित हो रही थी। आरोप है कि वे बिना उचित सूचना के लंबे समय तक अपने कार्यस्थल से अनुपस्थित रहे, जिससे विभागीय कार्यों पर भी असर पड़ा।
पुलिस विभाग में अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है, और किसी भी कर्मचारी द्वारा सेवा नियमों का उल्लंघन गंभीरता से लिया जाता है। इसी क्रम में शहडोल के पुलिस अधीक्षक रामजी श्रीवास्तव ने मामले की समीक्षा के बाद कार्रवाई करते हुए विवेकानंद तिवारी को निलंबित करने का आदेश जारी किया।
सूत्रों के अनुसार, उनके विरुद्ध सामान्य सेवा शर्तों के उल्लंघन, बिना अनुमति अनुपस्थिति और ड्यूटी के प्रति लापरवाही जैसे आरोप लगाए गए हैं। विभागीय स्तर पर यह भी पाया गया कि उनकी सोशल मीडिया गतिविधियां उनकी आधिकारिक जिम्मेदारियों के साथ संतुलित नहीं थीं, जिससे कार्यक्षमता प्रभावित हुई।
इस कार्रवाई के बाद पुलिस विभाग में यह संदेश स्पष्ट हुआ है कि ड्यूटी और अनुशासन से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं होगा, चाहे कर्मचारी कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो। विभागीय नियमों के अनुसार, सभी पुलिसकर्मियों को अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी कानून व्यवस्था बनाए रखना और जनता की सेवा करना है।

मामले के बाद सोशल मीडिया पर भी यह विषय चर्चा का केंद्र बन गया है। कुछ लोग इसे अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में सही ठहरा रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि यदि कोई पुलिसकर्मी लोगों को जागरूक कर रहा था तो उसे संतुलन के साथ अवसर मिलना चाहिए था।
हालांकि, पुलिस विभाग का स्पष्ट मत है कि किसी भी प्रकार की अतिरिक्त गतिविधि तभी स्वीकार्य है जब वह ड्यूटी और विभागीय कार्यों में बाधा न बने। यदि कार्य में लापरवाही पाई जाती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई अनिवार्य होती है।
विवेकानंद तिवारी की पहचान सोशल मीडिया पर एक ऐसे पुलिसकर्मी के रूप में बनी थी जो ट्रैफिक नियमों को सरल और रोचक अंदाज में समझाते थे। उनके वीडियो में अक्सर सड़क सुरक्षा, हेलमेट पहनने, सीट बेल्ट लगाने और यातायात नियमों के पालन जैसे संदेश दिए जाते थे। उनकी इस शैली ने उन्हें इंटरनेट पर एक अलग पहचान दिलाई थी।
लेकिन विभागीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो किसी भी सरकारी कर्मचारी के लिए सेवा नियमों का पालन सर्वोपरि होता है। अनुशासनहीनता और अनुपस्थिति जैसे मामलों में विभाग कठोर रुख अपनाता है ताकि संगठन की कार्यप्रणाली प्रभावित न हो।
पुलिस अधीक्षक रामजी श्रीवास्तव द्वारा की गई इस कार्रवाई को विभागीय अनुशासन बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में भी यदि कोई कर्मचारी सेवा नियमों का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ इसी प्रकार की कार्रवाई की जाएगी।
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सोशल मीडिया और सरकारी जिम्मेदारियों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए। जहां एक ओर डिजिटल प्लेटफॉर्म जागरूकता फैलाने का माध्यम बन रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिम्मेदार पदों पर कार्यरत व्यक्तियों के लिए अनुशासन और कर्तव्य सर्वोपरि रहता है।
कुल मिलाकर, यह मामला पुलिस विभाग के लिए एक अनुशासनात्मक उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है, जो यह स्पष्ट करता है कि लोकप्रियता से ऊपर सेवा नियम और कर्तव्य पालन सर्वोच्च प्राथमिकता हैं।
News Editor- (Jyoti Parjapati)
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